विचार · 12 जून 2026

सत्ता पक्ष को ताकत देता विपक्ष का वैचारिक दिवालियापन

By · द्वारा

प्रमोद कुमार गोयल

Pramod Kumar Goel · Founder & Editor

12 June 2026

7 min read · लगभग 7 मिनट

Meerut, Uttar Pradesh

विपक्ष की लगातार गिरती विश्वसनीयता और उसकी नकारात्मक राजनीति आज भारतीय लोकतंत्र का सबसे बड़ा संकट बन चुकी है। लोकतंत्र का स्वास्थ्य इस बात पर निर्भर करता है कि विपक्ष जनता के सामने एक गंभीर, जिम्मेदार और विश्वसनीय विकल्प बनकर खड़ा हो। दुर्भाग्य से, भारत का मुख्य विपक्ष पिछले कुछ वर्षों में इस कसौटी पर बेहद कमजोर साबित हुआ है। उसकी राजनीति में सकारात्मक विज़न की जगह सिर्फ आक्रोश और रचनात्मक आलोचना की जगह संवैधानिक संस्थाओं पर अविश्वास अधिक दिखाई देता है। राहुल गांधी और विपक्षी राजनीति की सबसे बड़ी समस्या यह है कि वह पूरी तरह मोदी-विरोध के इर्दगिर्द सिमट कर रह गई है। जनता केवल यह नहीं सुनना चाहती कि सरकार कहाँ गलत है; वह यह भी जानना चाहती है कि विपक्ष देश को किस दिशा में ले जाना चाहता है। लेकिन विकल्प देने के बजाय विपक्ष की राजनीति आज सिर्फ शिकायत, आरोपों और व्यक्तिगत टकराव के जाल में फंसी हुई है। यही कारण है कि वह व्यापक जनविश्वास अर्जित करने में लगातार नाकाम हो रहा है।

यह स्थिति तब और अधिक गंभीर हो जाती है जब विपक्ष अपनी राजनीतिक हार का ठीकरा लोकतांत्रिक संस्थाओं पर फोड़ने लगता है। चुनाव हारने के बाद EVM, चुनाव आयोग और पूरी चुनावी प्रक्रिया पर सवाल उठाना देश के मतदाताओं के विवेक का अपमान है। हर हार को साजिश बताना अंततः लोकतंत्र की जड़ों में ही अविश्वास पैदा करता है। इसी तरह, राष्ट्रीय सुरक्षा और सेना के अभियानों या सर्जिकल स्ट्राइक पर बिना ठोस प्रमाण के संदेह जताना आम मतदाता को असहज करता है। प्रधानमंत्री के लिए ‘चौकीदार चोर है’, ‘सरेंडर मोदी’ व ‘गद्दार’ जैसी अपमानजनक भाषा का निरंतर प्रयोग विपक्ष की राजनीतिक अपरिपक्वता को ही उजागर करता है। विपक्ष की यह वर्तमान दिशा केवल घरेलू राजनीतिक मुद्दों तक सीमित नहीं है, बल्कि उसके कुछ निर्णयों और बयानों ने राष्ट्रीय अस्मिता तथा सांस्कृतिक मूल्यों पर भी गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं, जिससे जनता के मन में तीन बड़े सुलगते प्रश्न उठ रहे हैं।

पहला प्रश्न यह उठता है कि भारत का विपक्ष कई बार भारत-विरोधी विदेशी ताकतों के सुर में सुर मिलाता हुआ क्यों दिखाई देता है? राहुल गांधी सहित विपक्ष के बड़े नेताओं द्वारा विदेशी धरती पर जाकर भारतीय लोकतंत्र की आलोचना करना, देश की संप्रभु संस्थाओं को कमजोर बताना और वैश्विक मंचों पर भारत की छवि को धूमिल करने वाले नैरेटिव का हिस्सा बनना आम नागरिक को कचोटता है। जब भी देश के अंदर आंतरिक अशांति या अस्थिरता पैदा करने की वैश्विक कोशिशें होती हैं, तब विपक्ष का रुख सरकार को घेरने के चक्कर में अनजाने में देश-विरोधी ताकतों को बल देता हुआ प्रतीत होता है।

दूसरा यक्ष प्रश्न यह है कि विपक्ष हर वक्त एक विशेष वर्ग यानी मुस्लिम तुष्टिकरण की राजनीति में ही क्यों उलझा हुआ दिखाई देता है? बहुसंख्यक समाज की जायज चिंताओं को दरकिनार कर केवल वोट बैंक को सुरक्षित रखने की यह छटपटाहट लोकतंत्र की मूल भावना के विपरीत है। न्याय और समानता के सिद्धांत को छोड़कर जब विपक्ष विशेष धार्मिक तुष्टिकरण को ही धर्मनिरपेक्षता का एकमात्र पैमाना मान लेता है, तो इससे समाज में विभाजन और अविश्वास की खाई और गहरी होती है। विकास, शिक्षा और रोजगार जैसे बुनियादी मुद्दों को छोड़कर बार-बार सांप्रदायिक आधार पर ध्रुवीकरण की कोशिश करना विपक्ष की वैचारिक कंगाली को दर्शाता है।

तीसरा और सबसे संवेदनशील प्रश्न यह है कि विपक्ष का एक बड़ा धड़ा लगातार सनातन धर्म और भारतीय संस्कृति के प्रतीकों को लेकर इतनी आक्रामक और अपमानजनक भाषा का प्रयोग क्यों करता है? इसकी शुरुआत तब दिखी जब तमिलनाडु के द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (DMK) गठबंधन के शीर्ष नेताओं ने सनातन की तुलना "मलेरिया, डेंगू या HIV" जैसी जानलेवा बीमारियों से करते हुए इसे समूल नष्ट करने का आह्वान किया। सांस्कृतिक मूल्यों पर आघात करने का यह सिलसिला यहीं नहीं रुका; कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे के पुत्र और कर्नाटक सरकार में मंत्री प्रियंक खड़गे ने भी सनातन परंपराओं तथा हिंदुत्व को लेकर बार-बार विवादित और तल्ख टिप्पणियां कीं। सनातन धर्म के प्रति इस प्रकार की घृणास्पद बयानबाजी पर राष्ट्रीय स्तर के शीर्ष विपक्षी नेताओं की रहस्यमयी चुप्पी यह साफ संदेश देती है कि वे बहुसंख्यक समाज की आस्था को ठेस पहुंचाकर भी अपनी राजनीति चमकाना चाहते हैं। सच्चाई यह है कि भारत की आत्मा माने जाने वाले सनातन से यह खुला बैर और वैचारिक दूरी आज विपक्ष को देश के आम जनमानस से पूरी तरह काट रही है।

सच्चाई यह है कि आज सत्तापक्ष की सबसे बड़ी ताकत केवल उसका मजबूत और अनुशासित संगठन ही नहीं, बल्कि विपक्ष का यही गहरा वैचारिक दिवालियापन और नकारात्मक रवैया भी है, जो सत्तापक्ष को निरंतर शानदार चुनावी सफलताओं की ओर अग्रसर कर रहा है। इसके प्रत्यक्ष नमूने समय-समय पर देश के सामने आते रहे हैं, जहाँ विपक्ष राष्ट्रीय सुरक्षा और वैश्विक मंचों पर देश की छवि को ही दांव पर लगाता दिखा। डोकलाम सीमा विवाद के संवेदनशील समय पर राहुल गांधी का गुपचुप तरीके से चीनी दूतावास के अधिकारियों से मिलना हो, या प्रधानमंत्री के हर सफल विदेशी दौरे की सराहना करने के बजाय उसकी खिल्ली उड़ाना; विपक्ष की संकीर्ण सोच हर जगह उजागर हुई है। यहाँ तक कि कोरोना संकट के समय स्वदेशी वैक्सीन को मोदी वैक्सीन कहकर बदनाम करना और भारत के वैश्विक गौरव बने जी-20 शिखर सम्मेलन को महज एक चुनावी तमाशा बताना इसी आत्मघाती राजनीति का हिस्सा था।

यह भटकाव केवल अंतरराष्ट्रीय मोर्चे तक सीमित नहीं है, बल्कि देश के भीतर भी विपक्ष विकास और लोकतांत्रिक मर्यादाओं का विरोधी बनता जा रहा है। नए संसद भवन के ऐतिहासिक उद्घाटन का केवल राजनीतिक द्वेष के कारण बहिष्कार करना और राष्ट्रीय सुरक्षा के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण ग्रेट निकोबार स्ट्रेटेजिक प्रोजेक्ट का पर्यावरण के नाम पर पुरजोर विरोध करना इसके अकाट्य प्रमाण हैं। सकारात्मक एजेंडे के अभाव में आम चुनावों के दौरान "संविधान बदल दिया जाएगा" जैसे डरावने और आधारहीन नैरेटिव फैलाकर जनता को गुमराह करने की कोशिश की गई। विधायी मर्यादाओं को तार-तार करने का चरम तो हाल ही में तब दिखा, जब एक पूर्व सेना प्रमुख की अप्रकाशित किताब के अप्रमाणित दावों को कोट करने की जिद पर अड़कर राहुल गांधी और समूचे विपक्ष ने संसद को एक सप्ताह तक ठप रखा और देश के करोड़ों रुपये का जन-धन बर्बाद कर दिया।

जब विपक्ष एक सकारात्मक और जिम्मेदार विकल्प बनने के बजाय लगातार इस तरह का देश-विरोधी, प्रगति-विरोधी और व्यवस्था-विरोधी रुख अपनाता है, तब देश का जागरूक मतदाता स्थिरता और राष्ट्रवाद के नाम पर सत्तापक्ष की ओर और अधिक मजबूती से झुक जाता है। भारत जैसे विशाल लोकतंत्र में मजबूत विपक्ष कोई विलासिता नहीं, बल्कि अनिवार्यता है। लेकिन मजबूत विपक्ष वही बन सकता है जो देश की संप्रभुता, संस्थाओं और राष्ट्रीय हितों का सम्मान करे; और केवल अंध-विरोध के इस आत्मघाती रास्ते को छोड़कर देश के विकास के लिए एक सकारात्मक एवं विश्वसनीय विज़न पेश करे।

About the author

प्रमोद कुमार गोयल

Pramod Kumar Goel · Founder & Editor

पंजाब नेशनल बैंक से सेवानिवृत्त अधिकारी, मेरठ निवासी। एक अनुभवी लेखक एवं संपादक, जिनकी रचनाएँ देश के अनेक प्रमुख समाचार-पत्रों एवं मीडिया मंचों पर प्रकाशित होती रही हैं।

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