विचार · 12 जून 2026
सनातन रहेगा, विद्वेष हार जाएगा
By · द्वारा
प्रमोद कुमार गोयल
Pramod Kumar Goel · Founder & Editor
12 June 2026
5 min read · लगभग 5 मिनट
Meerut, Uttar Pradesh
भारत की आत्मा यदि किसी एक शब्द में समाहित होती है, तो वह है—सनातन। यह केवल किसी धर्म-विशेष की पहचान नहीं, बल्कि मानवता, सहिष्णुता, कर्तव्य, करुणा और समस्त सृष्टि के कल्याण की वह जीवन-दृष्टि है जिसने हजारों वर्षों से इस भूमि को सभ्यता का आलोक प्रदान किया है। यही कारण है कि जब-जब सनातन पर प्रहार होता है, तब-तब वह केवल किसी आस्था पर हमला नहीं होता, बल्कि भारत की सांस्कृतिक चेतना को आहत करने का प्रयास होता है।
हाल के वर्षों में कुछ राजनीतिक नेताओं और तथाकथित प्रगतिशील समूहों द्वारा सनातन उन्मूलन जैसे वक्तव्य दिए गए। कहीं सनातन की तुलना डेंगू, मलेरिया जैसी बीमारियों से की गयी, तो कहीं इसे सामाजिक विषमता का मूल कारण बताकर समाप्त करने की बात कही गयी। लोकतंत्र और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर करोड़ों लोगों की आस्था का उपहास करना आज कुछ वर्गों के लिए वैचारिक आधुनिकता का प्रतीक बन गया है। जबकि असहमति और घृणा में स्पष्ट अंतर होता है। स्वस्थ आलोचना लोकतंत्र की आत्मा है, किंतु किसी सभ्यता को मिटाने की भाषा सभ्य समाज की भाषा नहीं कही जा सकती।
सनद रहे कि ऐसे सनातन विरोधी और घृणा फैलाने वाले तथाकथित नेताओं को जनता ने हाल के विधानसभा चुनावों में सत्ता से हटाकर कठोर संदेश दिया है। मतदाताओं ने स्पष्ट कर दिया कि भारत की सांस्कृतिक चेतना का अपमान कर राजनीतिक लाभ नहीं उठाया जा सकता। किंतु दुर्भाग्य यह है कि इन तत्वों ने अभी तक कोई सबक नहीं सीखा। आज भी वे अवसर मिलते ही सनातन के विरुद्ध विषवमन कर समाज को बाँटने का प्रयास करते दिखाई देते हैं। यह केवल राजनीतिक अपरिपक्वता नहीं, बल्कि भारतीय जनमानस की आस्था और संवेदनाओं के प्रति गहरे अनादर का प्रमाण है।
विडंबना यह है कि सनातन, जिसकी मूल भावना वसुधैव कुटुम्बकम् और सर्वे भवन्तु सुखिनः है, उसी को आज संकीर्णता का प्रतीक सिद्ध करने का प्रयास हो रहा है। ऋग्वेद का उद्घोष—एकं सद्विप्रा बहुधा वदन्ति—यह स्पष्ट करता है कि सत्य एक है, किंतु ज्ञानी उसे अनेक रूपों में देखते हैं। यही कारण है कि सनातन परंपरा ने कभी किसी अन्य मत या पंथ के अस्तित्व का विरोध नहीं किया।
एक सनातनी हिंदू अपने संस्कारों में ही सर्व धर्म समभाव की शिक्षा ग्रहण करता है। भारत ने सदियों से पारसियों को शरण दी, यहूदियों को सम्मान दिया, बौद्ध-जैन परंपराओं को आत्मीयता से अपनाया और विविध उपासना पद्धतियों को समान आदर प्रदान किया। शायद ही कोई उदाहरण मिले जहाँ सनातनी समाज ने संगठित रूप से किसी अन्य धर्म के आराध्यों या प्रतीकों का सार्वजनिक उपहास किया हो। यह सहिष्णुता किसी राजनीतिक रणनीति का परिणाम नहीं, बल्कि सनातन के मूल स्वभाव का परिचायक है।
किन्तु दुखद सत्य यह है कि जो लोग किसी कारणवश अपनी जड़ों से कट गए, वही अनेक बार सनातन के प्रति सबसे अधिक कटुता प्रकट करते दिखाई देते हैं। धर्मांतरण या वैचारिक परिवर्तन किसी व्यक्ति का निजी अधिकार हो सकता है, परंतु अपनी पूर्व परंपरा के प्रति विषवमन करना न तो नैतिकता है और न ही सभ्यता। आज अनेक मंचों पर कुछ लोग बढ़-चढ़कर सनातन को पिछड़ा, अमानवीय या समाप्त कर देने योग्य बताने का दुस्साहस करते हैं। यह केवल वैचारिक असहमति नहीं, बल्कि अपनी सांस्कृतिक विरासत के प्रति हीनभावना और विद्वेष का द्योतक है।
दुर्भाग्यपूर्ण यह भी है कि कुछ राजनीतिक शक्तियाँ इस मानसिकता को प्रोत्साहित करती हैं, क्योंकि उन्हें लगता है कि बहुसंख्यक आस्था का अपमान प्रगतिशीलता का प्रमाण है। यदि किसी अन्य धर्म के विरुद्ध ऐसी भाषा प्रयोग की जाती, तो वही लोग उसे घृणा और असहिष्णुता बताते। किंतु सनातन के मामले में अपमान को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का नाम देकर उचित ठहराने का प्रयास किया जाता है। यह दोहरा मापदंड सामाजिक वैमनस्य को जन्म देता है।
सनातन का वांग्मय हमें संयम, करुणा और आत्मचिंतन की शिक्षा देता है। गीता में भगवान कृष्ण युद्धभूमि में भी धर्म और मर्यादा का संदेश देते हैं। उपनिषद समस्त जगत में एक ही आत्मा के दर्शन करना सिखाते हैं। स्वामी विवेकानंद ने विश्व को भारतीय अध्यात्म की सार्वभौमिकता से परिचित कराया। ऐसी विराट परंपरा को कुछ राजनीतिक वक्तव्यों या क्षुद्र मानसिकताओं से परिभाषित नहीं किया जा सकता।
आज आवश्यकता इस बात की है कि सनातनी समाज प्रतिक्रिया में कटुता का मार्ग न अपनाए, बल्कि ज्ञान, तर्क और सांस्कृतिक आत्मविश्वास से उत्तर दे। क्योंकि सनातन की वास्तविक शक्ति उसकी उदारता, सहिष्णुता और आत्मबल में निहित है। इतिहास साक्षी है कि इस देश की संस्कृति जितनी बार आहत हुई, उतनी ही शक्ति से पुनः खड़ी हुई। सनातन किसी व्यक्ति, दल या संस्था का मोहताज नहीं; वह इस राष्ट्र की शाश्वत चेतना है। अतः ऐसी क्षुद्र और नीच मानसिकता, जो सनातन के प्रति विषवमन कर समाज को विभाजित करना चाहती है, उसका वैचारिक प्रतिकार समय की आवश्यकता है। क्योंकि सनातन का अर्थ ही है—जो अनादि है, अनंत है और मानवता के कल्याण के लिए सदैव जीवित रहेगा।
About the author
प्रमोद कुमार गोयल
Pramod Kumar Goel · Founder & Editor
पंजाब नेशनल बैंक से सेवानिवृत्त अधिकारी, मेरठ निवासी। एक अनुभवी लेखक एवं संपादक, जिनकी रचनाएँ देश के अनेक प्रमुख समाचार-पत्रों एवं मीडिया मंचों पर प्रकाशित होती रही हैं।
पहले अंक की प्रतीक्षा है?
अगले लेख से पहले सूचना पाएँ
Get notified before the next essay arrives.