विचार · 12 जून 2026

सभ्यतागत चेतना और भारतीय राजनीति का मूल चरित्र

By · द्वारा

प्रमोद कुमार गोयल

Pramod Kumar Goel · Founder & Editor

12 June 2026

3 min read · लगभग 3 मिनट

Meerut, Uttar Pradesh

भारतीय राजनीति को पश्चिम के चश्मे, यूरोपीय सिद्धांतों या 'सेक्युलरिज़्म' जैसी आयातित अवधारणाओं से समझना वैसा ही है, जैसे समंदर की गहराई को उसकी सतही लहरों से मापना। पश्चिम की राजनीति राष्ट्र-राज्य के अनुबंध पर आधारित है, जहाँ सत्ता और समाज का संबंध केवल नागरिक अधिकारों और टैक्स के लेन-देन तक सीमित होता है। इसके विपरीत, भारत केवल एक प्रशासनिक इकाई नहीं, बल्कि एक जीवंत सभ्यतागत राज्य है। यही कारण है कि यहाँ की राजनीति का मूल चरित्र आज भी अपनी सनातन चेतना और सांस्कृतिक स्मृतियों से ही संचालित होता है।

इस चेतना के केंद्र में हमेशा से एक सशक्त, निर्णायक और सर्वस्वीकार्य नायक की खोज रही है, जिसे हमारे इतिहास और दर्शन में 'चक्रवर्ती' कहा गया है। भारत का सामूहिक मानस स्वभाव से बिखराव या कमजोर व्यवस्थाओं को स्वीकार नहीं करता। उसे एक ऐसी केंद्रीय धुरी की आवश्यकता होती है जो पूरे समाज को एकता के सूत्र में पिरो सके और व्यवस्था को अराजकता से बचा सके। भारतीय दर्शन में इस अराजकता को 'मत्स्य न्याय' कहा गया है—जहाँ मजबूत निर्बल को निगल जाता है। समकालीन राजनीति में जो कड़े फैसले लेने की क्षमता और एकछत्र नायक के प्रति जनता का गहरा आकर्षण दिखाई देता है, वह असल में मत्स्य न्याय से मुक्ति पाने की भारत की उसी प्राचीन, सुप्त आकांक्षा का आधुनिक प्रकटीकरण है।

इस व्यवस्था का दूसरा सबसे महत्वपूर्ण स्तंभ है 'योगक्षेम'—अर्थात प्रजा की सुरक्षा, उसका भरण-पोषण और उसका कल्याण। चाणक्य ने स्पष्ट लिखा था कि प्रजा के सुख में ही राजा का सुख निहित है। आज के दौर के विश्लेषक जिसे मुफ्त की योजनाएं या वेलफेयर मॉडल कहकर इसकी आलोचना करते हैं, वह भारतीय मानस के लिए कोई खैरात नहीं है। जनता इसे शासन द्वारा अपनी प्रजा के प्रति निभाया जाने वाला उसका राजधर्म मानती है। यह एक ऐसा सामाजिक अनुबंध है जो पश्चिम के समाजवाद से भिन्न, एक संरक्षक और उसके आश्रितों के बीच का पवित्र संबंध है।

तीसरा और सबसे गहरा सत्य है—सांस्कृतिक पुनरुत्थान। भारत की आत्मा को उसकी जड़ों, उसकी आध्यात्मिक पहचान और उसके गौरवशाली अतीत से काटकर यहाँ की राजनीति को लंबे समय तक दिशाहीन नहीं रखा जा सकता। औपनिवेशिक मानसिकता और कृत्रिम विमर्शों के दौर में जिस चेतना को दबाने का प्रयास किया गया, आज समाज उसी के साथ एक नई सांस्कृतिक करवट ले रहा है। यह किसी दल का सामयिक एजेंडा मात्र नहीं, बल्कि भारत का अपने आत्म-गौरव की ओर लौटना है।

निष्कर्षतः, भारतीय राजनीति का भविष्य और उसका हल इसी भूमि के शाश्वत सूत्रों में छुपा है। आने वाले समय में केवल वही विमर्श दीर्घजीवी होगा, जो 'शक्ति' (सशक्त राज्य), 'संस्कृति' (सभ्यतागत गौरव) और 'कल्याण' (प्रजा का योगक्षेम) के इस त्रिकोण को पूरी प्रामाणिकता के साथ साध सकेगा। यही वह सनातन पथ है, जिस पर चलकर भारत अपनी राजनीतिक और सांस्कृतिक नियति को प्राप्त करता है।

About the author

प्रमोद कुमार गोयल

Pramod Kumar Goel · Founder & Editor

पंजाब नेशनल बैंक से सेवानिवृत्त अधिकारी, मेरठ निवासी। एक अनुभवी लेखक एवं संपादक, जिनकी रचनाएँ देश के अनेक प्रमुख समाचार-पत्रों एवं मीडिया मंचों पर प्रकाशित होती रही हैं।

Meerut, Uttar PradeshDecades in printEditor & columnist

पहले अंक की प्रतीक्षा है?

अगले लेख से पहले सूचना पाएँ

Get notified before the next essay arrives.