विचार · 12 जून 2026

ग्रेट निकोबार से बंगाल तक भारत के अभेद्य किले को घेरने की साजिश

By · द्वारा

प्रमोद कुमार गोयल

Pramod Kumar Goel · Founder & Editor

12 June 2026

9 min read · लगभग 9 मिनट

Meerut, Uttar Pradesh

आज का भारत 21वीं सदी के वैश्विक मानचित्र पर एक आर्थिक और सामरिक महाशक्ति के रूप में उभर रहा है। लेकिन इतिहास गवाह है कि जब-जब कोई राष्ट्र अपनी संप्रभुता और शक्ति का विस्तार करता है, तब-तब वैश्विक भू-राजनीति के अदृश्य केंद्र और आंतरिक विभीषण सक्रिय हो जाते हैं। वर्तमान में भारत के खिलाफ लड़े जा रहे हाइब्रिड वॉर के दो सबसे बड़े केंद्र बिंदु हैं— दक्षिण में हिंद महासागर का ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट और पूर्व में सामरिक दृष्टि से अत्यंत संवेदनशील पश्चिम बंगाल।

प्रमोद कुमार गोयल का यह लेख केवल एक इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट या एक राज्य के चुनाव परिणाम का विश्लेषण नहीं है, बल्कि उस अंतरराष्ट्रीय नेटवर्क, ‘डीप स्टेट’ और घरेलू ‘लेफ्ट-लिबरल इकोसिस्टम’ के गठजोड़ का पर्दाफाश है, जो मानवाधिकार, पर्यावरण और लोकतंत्र की आड़ में भारत को अस्थिर करने का सुनियोजित प्रयास कर रहा है।

हिंद महासागर में अंडमान और निकोबार द्वीप समूह केवल पर्यटन का केंद्र नहीं हैं, बल्कि ये भारत के अभेद्य अचल विमानवाहक पोत हैं। केंद्र सरकार द्वारा ₹72,000 करोड़ (जो बढ़कर ₹92,000 करोड़ तक अनुमानित है) की लागत से विकसित की जा रही ग्रेट निकोबार अंतरराष्ट्रीय ट्रांसशिपमेंट पोर्ट परियोजना भारत की आने वाली सदियों का भाग्य तय करने वाली है। यह परियोजना दुनिया के सबसे व्यस्त समुद्री व्यापार मार्ग ‘स्ट्रैट्स ऑफ मलक्का’ के मुहाने पर स्थित है। चीन का लगभग 80% कच्चे तेल का आयात और उसका वैश्विक व्यापार इसी संकीर्ण जलमार्ग से होकर गुजरता है। सामरिक भाषा में इसे चीन की ‘मलक्का दुविधा’ कहा जाता है। यदि भारत ग्रेट निकोबार में एक विशाल सैन्य-सह-व्यापारिक बंदरगाह विकसित कर लेता है, तो युद्ध या तनाव की स्थिति में भारतीय नौसेना चीन की इस जीवनरेखा को कभी भी अवरुद्ध कर सकती है। यह चीन के ‘स्ट्रिंग ऑफ पर्ल्स’ की घेराबंदी का भारत द्वारा दिया गया सबसे करारा जवाब है। वर्तमान में भारत का अधिकांश ट्रांसशिपमेंट व्यापार कोलंबो, सिंगापुर या पोर्ट केलांग के माध्यम से होता है। निकोबार में इस पोर्ट के बनने से अरबों डॉलर का राजस्व भारत में आएगा और यह क्षेत्र वैश्विक व्यापार का मुख्य केंद्र बन जाएगा।

यही कारण है कि चीन और उसके समर्थक वैश्विक थिंक-टैंक इस परियोजना से बौखलाए हुए हैं। जब अप्रैल 2026 में कांग्रेस नेता राहुल गांधी निकोबार का दौरा करते हैं और इसे “प्रकृति और जनजातीय विरासत के खिलाफ महाघोटाला” करार देते हैं, तो देश के रक्षा विश्लेषकों के कान खड़े हो जाते हैं। यह विरोध पर्यावरण प्रेम से नहीं, बल्कि एक सोची-समझी राजनीतिक घेराबंदी के तहत प्रेरित दिखाई देता है। आलोचक सवाल उठाते हैं कि जब संप्रभुता और राष्ट्रीय सुरक्षा का प्रश्न हो, तो देश का मुख्य विपक्षी नेता उस परियोजना को रोकने की मांग कैसे कर सकता है जो चीन को सीधी चुनौती दे रही है।

ग्रेट निकोबार का विरोध करने वाले चेहरे नए नहीं हैं। यह वही पुराना, सुपर-कनेक्टेड इकोसिस्टम है जिसमें तीस्ता सीतलवाड़, अरुंधति रॉय, मेधा पाटकर, सुधा भारद्वाज, वरवर राव और गौतम नवलखा जैसे नाम शामिल हैं। इस लॉबी के राजनीतिक झुकाव और कार्यप्रणाली को समझने के लिए थोड़ा पीछे जाना होगा। वर्ष 2004 से 2014 के बीच सोनिया गांधी की अध्यक्षता में गठित नेशनल एडवाइजरी काउंसिल (NAC) भारतीय लोकतंत्र में एक सुपर-कैबिनेट की तरह काम करती थी। इस काउंसिल के माध्यम से देश के बाहर के कार्यकर्ताओं और वामपंथी बुद्धिजीवियों को सीधे देश की नीतियां और कानून तय करने का अधिकार मिल गया था। अरुणा रॉय और हर्ष मंदर जैसे लोग सीधे प्रधानमंत्री कार्यालय को प्रभावित करते थे। इस लॉबी ने सत्ता संरक्षण में रहते हुए भारत के औद्योगिक विकास को पंगु बना दिया था। पर्यावरण की आड़ लेकर वेदांता के नियामगिरि प्रोजेक्ट, उड़ीसा के पोस्को स्टील प्लांट और नर्मदा बांध जैसी बुनियादी ढांचा परियोजनाओं को वर्षों तक लटकाया गया। गृह मंत्रालय के आंतरिक दस्तावेजों के अनुसार, इस लॉबी के दबाव में तत्कालीन सरकार माओवादियों और नक्सलियों के खिलाफ सख्त सैन्य कदम उठाने से हिचकती रही। इसे ‘अर्बन नक्सलवाद’ का स्वर्ण काल कहा जा सकता है।

2014 में नरेंद्र मोदी सरकार के आने के बाद इस लॉबी का पूरा साम्राज्य ताश के पत्तों की तरह ढह गया। सबसे पहले NAC को भंग किया गया, जिससे नीति-निर्माण पर इनका नियंत्रण समाप्त हो गया। इसके बाद सरकार ने FCRA के नियमों को बेहद सख्त कर दिया। इसके तहत हजारों संदिग्ध एनजीओ के लाइसेंस रद्द किए गए, जिससे विदेशी पैसे के दम पर भारत में अशांति फैलाने की इनकी फंडिंग पाइपलाइन कट गई। सत्ता से बाहर होने और फंडिंग बंद होने की इसी बौखलाहट के कारण यह लॉबी आज वर्तमान सरकार की हर राष्ट्रीय सुरक्षा और विकास योजना के विरोध में खड़ी दिखाई देती है।

यह सोचना बेहद नादानी होगी कि यह लॉबी केवल वैचारिक रूप से प्रेरित है। इसके पीछे अरबों डॉलर का एक अंतरराष्ट्रीय फंडिंग नेटवर्क काम कर रहा है, जिसका उद्देश्य भारत की स्वतंत्र विदेश नीति और आर्थिक प्रगति को बाधित करना है। अमेरिकी अरबपति जॉर्ज सोरोस ने म्यूनिख सुरक्षा सम्मेलन में खुले मंच से एलान किया था कि वे भारत में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को सत्ता से हटाने और अपने मनमुताबिक लोकतांत्रिक पुनरुत्थान के लिए 1 बिलियन डॉलर का फंड दे रहे हैं। सोरोस का ‘ओपन सोसाइटी फाउंडेशन’ दुनिया भर में राष्ट्र-राज्यों की संप्रभुता को नष्ट करने के लिए कुख्यात है।

हालिया वैश्विक खुलासों से यह साबित हो चुका है कि जब भी भारत का कोई औद्योगिक घराना या भारत की नियामक संस्था वैश्विक स्तर पर चीन या पश्चिमी एकाधिकार को चुनौती देती है, तो अचानक एक विदेशी रिपोर्ट सामने आती है। खोजी पत्रकारों के वैश्विक संगठन OCCRP की लगभग 50% फंडिंग सीधे अमेरिकी सरकारी एजेंसी USAID और जॉर्ज सोरोस के फाउंडेशंस से आती है। संसद सत्र शुरू होने से ठीक पहले ऐसी विदेशी रिपोर्टों को प्लांट किया जाता है। इसके तुरंत बाद भारत में सक्रिय यह वामपंथी-लिबरल लॉबी और राहुल गांधी जैसे नेता उस नैरेटिव को सोशल मीडिया पर वायरल करते हैं, सुप्रीम कोर्ट में जनहित याचिकाएं डालते हैं और संसद को ठप कर देते हैं। यह देश के खिलाफ किया जाने वाला आर्थिक आतंकवाद है, ताकि विदेशी निवेशकों के बीच भारत की छवि खराब की जा सके।

विदेशी फंडिंग का खेल केवल अमेरिका तक सीमित नहीं है। फरवरी 2026 में प्रवर्तन निदेशालय द्वारा समाचार पोर्टल NewsClick पर ₹184 करोड़ का फेमा जुर्माना लगाया जाना इस बात का प्रमाण है। दिल्ली पुलिस की चार्जशीट के अनुसार, अमेरिकी उद्योगपति नेविल रॉय सिंघम के जरिए चीन से प्राप्त अवैध फंड का इस्तेमाल भारत-विरोधी प्रोपेगैंडा चलाने, कश्मीर पर चीनी नैरेटिव को बढ़ावा देने और भारत के बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स को बदनाम करने के लिए किया गया था।

भारत को अस्थिर करने की इस वैश्विक बिसात पर मई 2026 के पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव सबसे निर्णायक जंग साबित हुए। बंगाल केवल भारत का एक राज्य नहीं है; यह सामरिक रूप से उत्तर-पूर्व को जोड़ने वाले सिलिगुड़ी कॉरिडोर का रक्षक है और इसकी सीमाएं बांग्लादेश से लगती हैं। भारत सरकार के आर्थिक सलाहकार संजीव सान्याल और कई रक्षा विशेषज्ञों द्वारा उठाए गए सवाल इस ओर इशारा करते हैं कि अमेरिकी खुफिया एजेंसी CIA और उसका डीप स्टेट भारत की स्वतंत्र विदेश नीति से बेहद नाराज था। अमेरिकी सरकार की संस्था USAID द्वारा भारत में वोटर टर्नआउट और अन्य चुनावी गतिविधियों को प्रभावित करने के नाम पर करोड़ों डॉलर का फंड स्वीकृत किया गया था। सुरक्षा हलकों में यह सर्वविदित है कि USAID जैसी संस्थाएं अक्सर CIA के रणनीतिक एजेंडे को छिपाने के लिए एक मुखौटे की तरह काम करती हैं।

लेकिन बंगाल की जनता ने इस वैश्विक टूलकिट को पूरी तरह ध्वस्त कर दिया। भाजपा ने 207 सीटें जीतकर प्रचंड बहुमत हासिल किया और शुभेंदु अधिकारी राज्य के नए मुख्यमंत्री बने। यह परिणाम इतना असाधारण था कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने स्वयं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को फोन करके बधाई दी। बंगाल में राष्ट्रवाद-प्रेरित पूर्ण बहुमत की सरकार आने से सिलिगुड़ी कॉरिडोर हमेशा के लिए सुरक्षित हो गया है।

पश्चिम बंगाल में भाजपा की जीत और शुभेंदु अधिकारी के मुख्यमंत्री बनने का सबसे बड़ा झटका सीमा पार बांग्लादेश के कट्टरपंथियों को लगा है। ढाका की सड़कों पर ‘इस्लामी आंदोलन जैसे चरमपंथी संगठनों द्वारा बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन किए जा रहे हैं और प्रधानमंत्री मोदी व शुभेंदु अधिकारी को जान से मारने की खुली धमकियां दी जा रही हैं। ममता बनर्जी के शासनकाल में बांग्लादेशी घुसपैठियों को एक सुरक्षित वोट बैंक के रूप में इस्तेमाल किया जाता था। चुनाव से ठीक पहले चुनाव आयोग द्वारा किए गए विशेष गहन पुनरीक्षण के तहत 27 लाख संदिग्ध मतदाताओं के नाम वोटर लिस्ट से हटाए गए। इससे घुसपैठ के जरिए भारत की जनसांख्यिकी बदलने वाले अंतरराष्ट्रीय सिंडिकेट की रीढ़ टूट गई। अब बांग्लादेश को डर है कि शुभेंदु अधिकारी के नेतृत्व में अवैध प्रवासियों का बड़े पैमाने पर पुशबैक शुरू होगा।

मुख्यमंत्री बनते ही शुभेंदु अधिकारी ने बांग्लादेश से लगती भारत की सीमाओं को पूरी तरह अभेद्य बनाने का कार्य युद्ध स्तर पर शुरू कर दिया है। उन्होंने स्पष्ट कर दिया है कि भारत अब सीमा पार से होने वाली किसी भी शरारत को बर्दाश्त नहीं करेगा। इसी बौखलाहट में बांग्लादेश के ‘द डेली इंकलाब’ जैसे मंचों पर वीडियो जारी कर शुभेंदु अधिकारी को “बॉर्डर पर ही दफनाने” जैसी धमकियां दी जा रही हैं। भारतीय खुफिया ब्यूरो ने भी इनपुट दिया है कि बांग्लादेशी आतंकी गुटों ने मुख्यमंत्री के पैतृक आवास की रेकी की है, जो इस बात का प्रमाण है कि भारत-विरोधी ताकतें किस हद तक डरी हुई हैं।

ग्रेट निकोबार परियोजना से लेकर पश्चिम बंगाल के चुनाव परिणामों तक की कड़ियों को जोड़ने पर एक स्पष्ट और भयावह चित्र सामने आता है। भारत को बाहर से युद्ध में हराना असंभव है, इसलिए वैश्विक ताकतें भारत के भीतर गृहयुद्ध, आर्थिक मंदी और बुनियादी ढांचा परियोजनाओं को ठप करने की कूटनीति पर काम कर रही हैं। राहुल गांधी जैसे नेताओं का निकोबार जाकर सामरिक प्रोजेक्ट्स को रोकना और विदेशी ताकतों द्वारा बंगाल जैसे संवेदनशील राज्य में फंडिंग करना, इसी ग्रेट गेम का हिस्सा है। लेकिन 2026 का भारत बदल चुका है। बंगाल की सजग जनता ने बैलेट के जरिए विदेशी टूलकिट को जो जवाब दिया है और सरकार ने निकोबार में चीन की घेराबंदी के लिए जो कदम उठाए हैं, वे यह साबित करते हैं कि भारत अब किसी भी वैश्विक दबाव के आगे झुकने वाला नहीं है। देश के प्रत्येक नागरिक को राष्ट्रसुरक्षा से जुड़े इन मुद्दों पर राजनीति से ऊपर उठकर सोचने की आवश्यकता है, क्योंकि यदि निकोबार सुरक्षित है और बंगाल अभेद्य है, तभी भारत सुरक्षित है।

About the author

प्रमोद कुमार गोयल

Pramod Kumar Goel · Founder & Editor

पंजाब नेशनल बैंक से सेवानिवृत्त अधिकारी, मेरठ निवासी। एक अनुभवी लेखक एवं संपादक, जिनकी रचनाएँ देश के अनेक प्रमुख समाचार-पत्रों एवं मीडिया मंचों पर प्रकाशित होती रही हैं।

Meerut, Uttar PradeshDecades in printEditor & columnist

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