विचार · 12 जून 2026

मुखौटों का विवाह और बिखरते पुल: भारतीय दांपत्य का नया संकट

By · द्वारा

प्रमोद कुमार गोयल

Pramod Kumar Goel · Founder & Editor

12 June 2026

5 min read · लगभग 5 मिनट

Meerut, Uttar Pradesh

भारतीय समाज में विवाह को सात जन्मों का एक पवित्र और अटूट बंधन माना गया है। यह एक ऐसी संस्था रही है जिसने सदियों से हमारे पारिवारिक और सामाजिक ढांचे को संभाले रखा। लेकिन आधुनिक और डिजिटल दौर में इस मजबूत नींव में गहरी दरारें साफ दिखाई देने लगी हैं। आज चाहे प्रेम विवाह हो या पारंपरिक अरेंज मैरिज, दोनों ही जगह रिश्तों के टूटने की घटनाएँ बढ़ रही हैं।

जब हम कहते हैं कि “आजकल शादियाँ नहीं चल रहीं”, तो अक्सर हम सतही कारणों को दोष दे देते हैं। लेकिन असली संकट कहीं अधिक गहरा है। यह समस्या किसी एक लिंग की नहीं, बल्कि उस नए भारतीय मानस की है जो परंपरा और आधुनिकता के बीच एक कठिन संक्रमण काल से गुजर रहा है।

इस संकट को चार प्रमुख पहलुओं से समझा जा सकता है।

1. ‘परफॉर्मेंस’ बनाम ‘रियलिटी’: सोशल मीडिया और विवाह का उत्सववाद

आज का युवा विवाह को केवल एक साझेदारी के रूप में नहीं, बल्कि एक भव्य “इवेंट” की तरह देखने लगा है।

हल्दी, मेहंदी, प्री-वेडिंग शूट और आलीशान एंट्री—शादी का पूरा ढाँचा अब सोशल मीडिया और रील्स के लिए एक प्रदर्शन जैसा बनता जा रहा है। कई परिवार अपनी वर्षों की जमा पूँजी कुछ दिनों की चमक-दमक में खर्च कर देते हैं। लेकिन उत्सव समाप्त होने के बाद दंपती का सामना रोजमर्रा की वास्तविक जिंदगी, आर्थिक दबावों और एक-दूसरे के वास्तविक स्वभाव से होता है।

समस्या यह है कि हम अक्सर एक “परफेक्ट लाइफ पार्टनर” की कल्पना से प्रेम करने लगते हैं, वास्तविक इंसान से नहीं। और जब वास्तविक जीवन हमारी डिजिटल कल्पनाओं जैसा नहीं होता, तो रिश्ते बोझ लगने लगते हैं। परिवार अदालतों में बढ़ते वैवाहिक विवाद इसी बदलती मानसिकता की ओर संकेत करते हैं।

2. अत्यधिक व्यक्तिवाद और विकल्पों का भ्रम

आधुनिक जीवनशैली ने व्यक्ति को अपनी इच्छाओं और स्वतंत्रता के प्रति अधिक जागरूक बनाया है। यह बदलाव कई मायनों में सकारात्मक भी है, लेकिन इसके साथ एक नई समस्या भी उभरी है—रिश्तों में धैर्य और समर्पण की कमी।

डिजिटल दुनिया और डेटिंग ऐप्स ने “असीमित विकल्पों” का एक भ्रम पैदा कर दिया है। कई युवाओं के मन में यह भावना बैठ गई है कि यदि एक रिश्ता कठिन लग रहा है, तो दूसरा विकल्प हमेशा उपलब्ध है।

जब किसी रिश्ते को स्थायी और अंतिम नहीं माना जाता, तब उसमें भावनात्मक निवेश भी कम होने लगता है। यही कारण है कि महानगरों में वैवाहिक तनाव और तलाक के मामलों में उल्लेखनीय वृद्धि देखी जा रही है।

3. वैवाहिक संकट का मनोवैज्ञानिक पक्ष

रिश्तों में होने वाले संघर्ष केवल वैचारिक मतभेद नहीं होते, उनके पीछे गहरे मानसिक और भावनात्मक कारण भी काम करते हैं।

आज का अत्यधिक प्रतिस्पर्धी माहौल लोगों को अधिक आत्मकेंद्रित बना रहा है। कई बार व्यक्ति रिश्ते को साझेदारी नहीं, बल्कि नियंत्रण की वस्तु की तरह देखने लगता है। जब उसे लगता है कि साथी उसकी अपेक्षाओं या नियंत्रण से बाहर जा रहा है, तब अहंकार, क्रोध और प्रतिशोध की भावना तीव्र हो सकती है।

इसके साथ एक और समस्या जुड़ी है—दिखावे और वास्तविकता के बीच का तनाव। समाज और सोशल मीडिया के सामने “खुशहाल आधुनिक दंपती” का मुखौटा बनाए रखना, जबकि भीतर संबंध टूट रहा हो, व्यक्ति के मानसिक संतुलन पर भारी दबाव डालता है। छोटी-छोटी बहसें भी कई बार असामान्य आक्रोश में बदल जाती हैं।

4. रिश्तों के टूटने और अपराध का नया मनोविज्ञान

हाल के वर्षों में वैवाहिक संबंधों से जुड़े कुछ वीभत्स अपराधों ने समाज को झकझोर दिया है। ऐसे मामलों के पीछे केवल व्यक्तिगत क्रूरता ही नहीं, बल्कि सामाजिक दबाव भी एक कारण बनता है।

भारतीय समाज आज भी तलाक या अलगाव को सहज रूप से स्वीकार नहीं कर पाया है। कई लोग एक हिंसक, अपमानजनक या भावनात्मक रूप से मृत रिश्ते में केवल सामाजिक प्रतिष्ठा बचाने के लिए बने रहते हैं।

जब समाज सम्मानजनक अलगाव को असफलता या कलंक की तरह देखता है, तब कमजोर मानसिक स्थिति वाले कुछ लोग कानूनी और शांतिपूर्ण रास्ता अपनाने के बजाय खतरनाक और अपराधपूर्ण रास्तों की ओर मुड़ जाते हैं। यह प्रवृत्ति केवल व्यक्तिगत विफलता नहीं, बल्कि सामाजिक पाखंड और भावनात्मक अपरिपक्वता का भी संकेत है।

निष्कर्ष: समाधान दमन नहीं, भावनात्मक परिपक्वता है

शादियों को बचाने का समाधान न तो महिलाओं को फिर से पुराने दमनकारी ढाँचे में धकेलना है और न ही पुरुषों को केवल कठोर कानूनों के भय से नियंत्रित करना। असली समाधान सोच बदलने में है।

हमें यह स्वीकार करना होगा कि एक अपमानजनक या मानसिक रूप से मृत रिश्ते को जबरन ढोने से बेहतर है सम्मानजनक अलगाव। सफल विवाह वह नहीं जो केवल समाज के डर से चलता रहे, बल्कि वह है जिसमें दोनों व्यक्ति मानसिक रूप से सुरक्षित, सम्मानित और जीवित महसूस करें।

इसके साथ ही युवाओं को केवल करियर बनाना ही नहीं, बल्कि भावनात्मक साक्षरता भी सिखानी होगी—अपनी भावनाओं को बिना आक्रामक हुए व्यक्त करना, असहमति को संभालना और दूसरे को सुनना।

विवाह एक सुंदर साझेदारी है, जिसे स्वामित्व या अधिकार की भावना से नहीं, बल्कि दो स्वतंत्र व्यक्तियों के बीच आपसी सम्मान, संवेदनशीलता और समझदारी से ही बचाया जा सकता है।

About the author

प्रमोद कुमार गोयल

Pramod Kumar Goel · Founder & Editor

पंजाब नेशनल बैंक से सेवानिवृत्त अधिकारी, मेरठ निवासी। एक अनुभवी लेखक एवं संपादक, जिनकी रचनाएँ देश के अनेक प्रमुख समाचार-पत्रों एवं मीडिया मंचों पर प्रकाशित होती रही हैं।

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