विचार · 12 जून 2026
लॉकरों में कैद सोना: क्यों नहीं टूटेगी भारतीयों की ‘गोल्ड मोह’ की दीवार
By · द्वारा
प्रमोद कुमार गोयल
Pramod Kumar Goel · Founder & Editor
12 June 2026
5 min read · लगभग 5 मिनट
Meerut, Uttar Pradesh
भारत में सोना केवल एक धातु या निवेश का माध्यम नहीं, बल्कि सामाजिक प्रतिष्ठा, पारिवारिक सुरक्षा और सांस्कृतिक विरासत का प्रतीक है। यही कारण है कि वैश्विक आर्थिक संकट, रुपये की गिरती कीमत और विदेशी मुद्रा भंडार पर बढ़ते दबाव के बावजूद भारतीय घरों और लॉकरों में जमा हजारों टन सोना आज भी अर्थव्यवस्था की मुख्यधारा से बाहर पड़ा है। अनुमान है कि भारतीय परिवारों, धार्मिक संस्थानों और बैंक लॉकरों में लगभग 25 हजार टन सोना निष्क्रिय अवस्था में जमा है। इसकी कीमत खरबों डॉलर में आंकी जाती है। स्वाभाविक है कि सरकारें और आर्थिक नीति निर्माता बार-बार इस सोने को औपचारिक अर्थव्यवस्था में लाने की कोशिश करते हैं, ताकि सोने के आयात पर निर्भरता घटे और विदेशी मुद्रा की बचत हो सके।
हाल ही में सोने पर आयात शुल्क 6 प्रतिशत से बढ़ाकर 15 प्रतिशत करना भी इसी रणनीति का हिस्सा माना गया। सरकार की सोच है कि यदि घरेलू सोना बाजार में आए तो नए आयात की आवश्यकता कम होगी। लेकिन यह सोच कागजों पर जितनी सरल दिखाई देती है, व्यवहार में उतनी ही असंभव साबित होती है। इसकी वजह केवल भारतीयों का भावनात्मक लगाव नहीं, बल्कि सर्राफा बाजार की कठोर आर्थिक सच्चाइयां भी हैं।
दरअसल, कोई भी भारतीय परिवार अपने पुराने गहनों को बेचने या गलाने से पहले सबसे पहले नुकसान का हिसाब लगाता है। जब कोई व्यक्ति सोने का आभूषण खरीदता है तो वह केवल सोने की कीमत नहीं चुकाता, बल्कि मेकिंग चार्ज और वेस्टेज के नाम पर अतिरिक्त रकम भी देता है। यह खर्च कई बार 15 से 30 प्रतिशत तक पहुंच जाता है। समस्या तब और बढ़ जाती है जब वही गहना दोबारा बदलवाने या रीसाइकिल कराने की नौबत आती है। पुराने गहनों पर दिया गया मेकिंग चार्ज पूरी तरह डूब जाता है और नए गहने बनवाने पर फिर से वही खर्च उठाना पड़ता है। ऊपर से जीएसटी अलग। ऐसे में उपभोक्ता को अपनी कुल संपत्ति पर 20 से 25 प्रतिशत तक का सीधा नुकसान सहना पड़ता है। कोई भी समझदार व्यक्ति केवल सरकारी अपील पर अपनी मेहनत की जमा पूंजी को इस तरह घाटे में नहीं डालना चाहेगा।
इसके अलावा भारतीय सर्राफा बाजार में भरोसे का संकट भी कम गंभीर नहीं है। आज भले ही हॉलमार्किंग अनिवार्य हो गई हो, लेकिन घरों में रखा अधिकांश सोना दशकों पुराना है। जब लोग पुराने गहने लेकर जौहरी के पास पहुंचते हैं, तब अक्सर शुद्धता को लेकर विवाद खड़ा हो जाता है। कई जौहरी सोने को पिघलाने के बाद उसकी कैरेट क्षमता कम बताकर कटौती कर देते हैं। आम उपभोक्ता के लिए यह साबित करना मुश्किल होता है कि उसका गहना वास्तव में कितने कैरेट का था। यही कारण है कि लोग लॉकर में रखा सोना ज्यादा सुरक्षित मानते हैं और बाजार की अनिश्चितताओं से दूर रखना पसंद करते हैं।
सोने के प्रति भारतीय समाज का भावनात्मक संबंध भी इस पूरी बहस का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष है। पश्चिमी देशों में सोना निवेश का साधन हो सकता है, लेकिन भारत में यह पीढ़ियों की स्मृतियों और रिश्तों से जुड़ा होता है। दादी का हार, मां की चूड़ियां और विवाह का मंगलसूत्र केवल आभूषण नहीं, बल्कि परिवार की परंपरा और भावनाओं के प्रतीक होते हैं। इन्हें गलाकर बैंक में जमा कर देना भारतीय मानसिकता के अनुकूल नहीं है। खासकर महिलाओं के लिए सोना ‘स्त्रीधन’ का रूप है, जो किसी भी आपात स्थिति में आर्थिक सुरक्षा देता है। बीमारी, पारिवारिक संकट या अचानक आई जरूरत में यही सोना बिना किसी कागजी प्रक्रिया के काम आता है। इसलिए लोग इसे बेचने को अंतिम विकल्प मानते हैं।
सरकार ने इस निष्क्रिय सोने को अर्थव्यवस्था में लाने के लिए गोल्ड मोनेटाइजेशन स्कीम जैसी योजनाएं भी शुरू कीं। योजना का उद्देश्य था कि लोग अपना सोना बैंक में जमा करें और उस पर ब्याज कमाएं। लेकिन यह योजना भी अपेक्षित सफलता हासिल नहीं कर सकी। इसकी सबसे बड़ी वजह यह रही कि बैंक जमा किए गए गहनों को पिघलाकर शुद्ध सोने में बदल देते हैं और योजना पूरी होने पर वही गहने वापस नहीं मिलते। भारतीय परिवार, विशेषकर महिलाएं, अपने विवाह या पारिवारिक विरासत से जुड़े गहनों को इस रूप में खत्म होते नहीं देखना चाहते। इसके अतिरिक्त आयकर विभाग की जांच और पुराने बिलों की अनुपलब्धता का डर भी लोगों को ऐसी योजनाओं से दूर रखता है।
एक और कड़वी सच्चाई यह है कि भारत में लंबे समय तक सोना बेहिसाब नकदी को सुरक्षित रखने का माध्यम भी बना रहा है। बड़ी मात्रा में सोना बिना बिल और नकद खरीद के जरिए घरों तक पहुंचा। ऐसे सोने को बाजार में लाना कई लोगों को कानूनी जोखिम जैसा लगता है। यही कारण है कि ऊंचे आयात शुल्क और कड़े नियमों के बावजूद सोने का अनौपचारिक कारोबार और तस्करी खत्म नहीं हो पाती। लोग औपचारिक बैंकिंग व्यवस्था में आने के बजाय निजी स्तर पर लेन-देन करना ज्यादा सुरक्षित समझते हैं।
स्पष्ट है कि भारतीय घरों में बंद यह विशाल स्वर्ण भंडार केवल आर्थिक संपत्ति नहीं, बल्कि सामाजिक और मनोवैज्ञानिक संरचना का हिस्सा है। सरकार चाहे कितनी भी योजनाएं बना ले, जब तक बाजार में पारदर्शिता, भरोसा और आर्थिक लाभ सुनिश्चित नहीं होगा, तब तक यह सोना लॉकरों से बाहर नहीं आएगा। इसलिए सरकार को केवल पुराने सोने को निकालने की जिद छोड़कर भविष्य की रणनीति पर ध्यान देना चाहिए। सॉवरेन गोल्ड बॉन्ड, डिजिटल गोल्ड और अन्य आधुनिक निवेश विकल्पों को अधिक आकर्षक बनाना ही बेहतर रास्ता हो सकता है, ताकि आने वाली पीढ़ियां भौतिक सोने के बजाय वित्तीय विकल्पों को प्राथमिकता दें। तभी भविष्य में नए सोने का विशाल हिस्सा लॉकरों में कैद होने से रोका जा सकेगा।
About the author
प्रमोद कुमार गोयल
Pramod Kumar Goel · Founder & Editor
पंजाब नेशनल बैंक से सेवानिवृत्त अधिकारी, मेरठ निवासी। एक अनुभवी लेखक एवं संपादक, जिनकी रचनाएँ देश के अनेक प्रमुख समाचार-पत्रों एवं मीडिया मंचों पर प्रकाशित होती रही हैं।
पहले अंक की प्रतीक्षा है?
अगले लेख से पहले सूचना पाएँ
Get notified before the next essay arrives.