विचार · 12 जून 2026
लाहौर ने बदले नाम, भारत अब भी दुविधा में
By · द्वारा
प्रमोद कुमार गोयल
Pramod Kumar Goel · Founder & Editor
12 June 2026
5 min read · लगभग 5 मिनट
Meerut, Uttar Pradesh
अमृतसर से महज 50 किलोमीटर दूर, दशकों तक कट्टर इस्लामीकरण के शिकंजे में रहे पाकिस्तान के ऐतिहासिक शहर लाहौर से एक ऐसी खबर आई है जिसने भारतीय उपमहाद्वीप के बौद्धिक और राजनीतिक विमर्श को चौंका दिया है। पंजाब की मरियम नवाज सरकार ने एक बड़ा फैसला लेते हुए लाहौर की 9 ऐतिहासिक जगहों के इस्लामी नाम बदलकर उनके मूल हिंदू, जैन और ब्रिटिश विरासत वाले नामों को आधिकारिक तौर पर बहाल कर दिया है। इसके तहत अब 'इस्लामपुरा' फिर से 'कृष्णनगर' बन गया है, और 1990 के दशक में बदला गया 'बाबरी मस्जिद चौक' एक बार फिर अपने मूल नाम 'जैन मंदिर चौक' के रूप में पहचान पा चुका है।
इस निर्णय ने भारत में भी ऐतिहासिक नामों की बहाली पर चल रही बहस को नया संदर्भ दे दिया है। जब एक घोर इस्लामी देश अपनी ऐतिहासिक और सांस्कृतिक जड़ों की ओर लौटने के व्यावहारिक लाभ समझ रहा है, तो भारत जैसे लोकतांत्रिक और सांस्कृतिक रूप से समृद्ध देश में अहमदाबाद, हैदराबाद और लखनऊ जैसे बड़े शहरों के नाम बदलने का एजेंडा आखिर क्यों अब भी प्रशासनिक फाइलों में अटका हुआ है?
भारत में शहरों के नाम बदलने की बहस कोई नई नहीं है। पिछले एक दशक में प्रयागराज, अयोध्या और संभाजीनगर जैसे शहरों को उनकी पुरानी पहचान वापस दिलाने के प्रयास हुए हैं। इसके बाद यह विमर्श और तेज हुआ कि नाम परिवर्तन केवल भूगोल का संशोधन नहीं, बल्कि सभ्यतागत स्मृति की पुनर्स्थापना भी हो सकता है। भारतीय जनता पार्टी के शासनकाल में ऐतिहासिक प्रतीकों को नए सिरे से परिभाषित करने की कोशिशें इसी सोच का हिस्सा मानी जाती रही हैं।
दिलचस्प बात यह है कि लाहौर में हुए इस बदलाव के पीछे वहाँ के स्थानीय नागरिकों की यह व्यावहारिक सोच भी काम कर रही है कि ऐतिहासिक नाम बदलने से पूर्वजों की विरासत और इतिहास का अस्तित्व नहीं बदलता। लाहौर के इस कदम ने भारतीय राजनीतिक विश्लेषकों को यह सोचने पर मजबूर कर दिया है कि क्या भारत में नाम बदलने की प्रक्रिया केवल चुनावी विमर्श का हिस्सा बनकर रह गई है या इसके पीछे कोई ठोस नीतिगत रोडमैप भी है?
गुजरात के मुख्यमंत्री रहते हुए नरेंद्र मोदी ने अहमदाबाद का नाम 'कर्णावती' करने की वकालत की थी। लेकिन केंद्र और राज्य दोनों जगह लंबे समय से भाजपा सरकार होने के बावजूद इस दिशा में कोई ठोस प्रगति नजर नहीं आती। हालिया सरकारी जवाबों से संकेत मिलता है कि केंद्र को इस विषय पर कोई नया प्रस्ताव नहीं भेजा गया है।
इसके पीछे सबसे बड़ी रुकावट वैश्विक पहचान की है। अहमदाबाद भारत का पहला ऐसा शहर है जिसे यूनेस्को का 'वर्ल्ड हेरिटेज सिटी' दर्जा प्राप्त है। नाम में अचानक बदलाव करने से उसकी अंतरराष्ट्रीय साख, वैश्विक पर्यटन, निवेश और ब्रांडिंग पर सीधा असर पड़ने का खतरा रहता है। अंतरराष्ट्रीय मंचों पर किसी स्थापित शहर की पहचान बदलना केवल राजनीतिक फैसला नहीं, बल्कि एक जटिल कूटनीतिक और आर्थिक विषय भी बन जाता है।
असल चुनौती केवल भावनात्मक नहीं, बल्कि प्रशासनिक और आर्थिक भी है। किसी बड़े शहर या महानगर का नाम बदलना महज प्रतीकात्मक निर्णय नहीं होता; इसके साथ भारी-भरकम प्रशासनिक और आर्थिक चुनौतियाँ जुड़ी होती हैं। भूमि और राजस्व रिकॉर्ड अपडेट करने से लेकर रेलवे, डाक सेवाओं और राष्ट्रीय राजमार्गों के साइनबोर्ड बदलने तक, तथा वैश्विक और स्थानीय डिजिटल प्लेटफॉर्म, जीपीएस एवं मैपिंग सॉफ्टवेयर को फिर से अपडेट करने तक — इस पूरी प्रक्रिया में सैकड़ों करोड़ रुपये का प्रत्यक्ष खर्च आता है। यही मुख्य कारण है कि गाजियाबाद, अलीगढ़ और मुजफ्फरनगर जैसे शहरों से जुड़े प्रस्ताव स्थानीय स्तर पर भारी चर्चा और राजनीतिक प्रस्ताव पारित होने के बावजूद आगे नहीं बढ़ पाते। एक विकासशील अर्थव्यवस्था में संसाधनों की प्राथमिकता बुनियादी ढाँचे, स्वास्थ्य और शिक्षा पर होनी चाहिए या नाम बदलने की खर्चीली प्रशासनिक प्रक्रिया पर — यह सवाल नीति निर्माताओं को हमेशा बैकफुट पर धकेल देता है।
हैदराबाद को 'भाग्यनगर' और लखनऊ को 'लक्ष्मणपुरी' कहने की मांग लगभग हर चुनाव से पहले राजनीतिक मंचों पर गूंजती है। हाल ही में शिवसेना (UBT) प्रमुख उद्धव ठाकरे द्वारा भाजपा को अहमदाबाद का नाम 'कर्णावती' करने की दी गई खुली चुनौती यह स्पष्ट करती है कि ये मुद्दे जनभावनाओं से जुड़े होने के कारण चुनावी नफा-नुकसान का बड़ा जरिया बन चुके हैं।
परंतु शासन का वास्तविक स्वरूप केवल वैचारिक आदर्शों या चुनावी नारों से तय नहीं होता, बल्कि व्यावहारिक निर्णयों से निर्धारित होता है। लाहौर का उदाहरण दिखाता है कि नाम परिवर्तन यदि सांस्कृतिक पुनर्संतुलन और इतिहास के संरक्षण के लिए हो, तो उसे बिना किसी राजनीतिक ड्रामे के प्रशासनिक सहमति के साथ लागू किया जा सकता है। भारत को भी यदि इस दिशा में आगे बढ़ना है, तो नाम बदलने की प्रक्रिया, प्राथमिकताओं और आर्थिक मानदंडों को लेकर एक स्पष्ट, पारदर्शी और एकसमान राष्ट्रीय नीति बनानी होगी। अन्यथा, यह महत्वपूर्ण विमर्श केवल चयनात्मकता के आरोपों और राजनीतिक नूराकुश्ती के बीच उलझकर दम तोड़ता रहेगा।
About the author
प्रमोद कुमार गोयल
Pramod Kumar Goel · Founder & Editor
पंजाब नेशनल बैंक से सेवानिवृत्त अधिकारी, मेरठ निवासी। एक अनुभवी लेखक एवं संपादक, जिनकी रचनाएँ देश के अनेक प्रमुख समाचार-पत्रों एवं मीडिया मंचों पर प्रकाशित होती रही हैं।
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