एवरेस्ट का कड़वा सच

विचार · 12 जून 2026

एवरेस्ट का कड़वा सच

By · द्वारा

प्रमोद कुमार गोयल

Pramod Kumar Goel · Founder & Editor

12 June 2026

5 min read · लगभग 5 मिनट

Meerut, Uttar Pradesh

समुद्र तल से 29,000 फीट ऊपर, जहाँ परिंदा भी पर नहीं मारता और मौत हर सेकंड इंसान का पीछा करती है... वहाँ हाल ही में एक अजीबोगरीब 'मेला' लगा। अखबार की सुर्खी आई—दुनिया की सबसे ऊंची चोटी पर नया वर्ल्ड रिकॉर्ड; एक ही दिन में 274 लोगों ने नापा एवरेस्ट, तिरंगा थामे तीन भारतीय भी शामिल!

पहली नजर में यह खबर सीना चौड़ा करती है, लेकिन जरा रुकिए... जहाँ लाशों को लांघकर रास्ता बनता हो, वहाँ एक दिन में पौने तीन सौ लोगों का हुजूम पहुंच जाना कामयाबी है या कुदरत के साथ कोई खौफनाक खिलवाड़? आइए, एवरेस्ट के उस सुलगते सच के पीछे चलते हैं जिसे हेडलाइंस अक्सर छिपा देती हैं।

इस खबर को देखकर आम दुनिया ने तालियां बजाईं, सोशल मीडिया पर बधाई संदेशों की बाढ़ आ गई। लेकिन इस चमक-दमक के पीछे छिपे उस कटु सत्य को किसी ने नहीं देखा, जिसने दुनिया की सबसे ऊंची और पवित्र चोटी को आज एक कॉमर्शियल पिकनिक स्पॉट और हाई एल्टीट्यूड कचराघर में तब्दील कर दिया है।

जो लोग सोच रहे हैं कि एक ही दिन में सैकड़ों लोगों का एवरेस्ट पर कतार लगाना इंसान की अदम्य इच्छाशक्ति की जीत है, वे मुगालते में हैं। सच तो यह है कि आज भी एवरेस्ट फतह करना उतना ही क्रूर और जानलेवा है जितना एडमंड हिलेरी और तेनजिंग नोर्गे के जमाने में था, लेकिन आज की 'भसड़' के पीछे साहस नहीं, बल्कि कॉर्पोरेट कंपनियों का पीआर स्टंट और अंधा पैसा बोल रहा है।

'इंस्टाग्राम फिल्टर' और स्पून-फीडिंग का खेल

आज से सात दशक पहले जब हिलेरी और तेनजिंग ऊपर गए थे, तो उनके सामने अज्ञात का भय था, रास्ता खुद खोजना था और खुद के फेफड़ों के दम पर जीना था। आज एवरेस्ट पर चढ़ाई एक खेल या साधना नहीं, बल्कि लाखों रुपये का पैकेज टूर और सोशल मीडिया कांटेंट बन चुका है। अमीर बिजनेसमैन और सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर्स 40 से 80 लाख रुपये तक की भारी-भरकम रकम देकर नामी कंपनियों के जरिए यहाँ पहुंचते हैं और शिखर पर अपनी रील्स बनाते हैं। हाथ में अपने देश का झंडा या अपनी कंपनी का लोगो लेकर मुस्कुराते हुए फोटो डालते हैं। इन तस्वीरों को देखकर दुनिया को लगता है कि “अरे, यह तो कितना आसान और मजेदार है!” लेकिन कोई भी अपनी वो तस्वीरें नहीं डालता जब वे तंबू के अंदर शून्य से 30 डिग्री नीचे तापमान में उल्टियां कर रहे होते हैं, या जब फेफड़ों में पानी भरने के कारण वे हर सांस के लिए छटपटा रहे होते हैं और खांसते हुए उनके मुंह से निकलता खून बर्फ की सफेदी को लाल कर रहा होता है।

इस दिखावे के पीछे की असल हकीकत यह है कि इस भारी-भरकम रकम के बदले इन रईस पर्वतारोहियों को स्पून-फीडिंग परोसी जाती है। शेरपा—जो इस पूरी कहानी के असली और गुमनाम नायक हैं—वे इनके आगे-आगे चलते हैं, रास्ता बनाते हैं, सीढ़ियां लगाते हैं, टेंट गाड़ते हैं और यहाँ तक कि भारी ऑक्सीजन सिलेंडर भी शेरपा ही ढोते हैं। कई बार तो बीमार क्लाइंट्स को शेरपा अपनी पीठ पर लादकर नीचे लाते हैं। लेकिन जब अखबार में फोटो छपती है और वाहवाही लूटने की बारी आती है, तो दुनिया के सामने नाम सिर्फ उस अमीर क्लाइंट का होता है।

'डेथ ज़ोन' में मौत का ट्रैफिक जाम

पहाड़ नहीं बदला, बदली हैं सुविधाएं। आज पर्वतारोहियों को बहुत नीचे से ही हाई-फ्लो सप्लीमेंटल ऑक्सीजन दे दी जाती है, जिससे शरीर को ऊंचाई का अहसास कम हो। लेकिन कुदरत को पूरी तरह चकमा नहीं दिया जा सकता। पूरे साल में मई के महीने में केवल 3 से 4 दिन ऐसे आते हैं जब मौसम साफ होता है, जिसे वेदर विंडो कहते हैं।

जैसे ही यह विंडो खुलती है, नीचे बेस कैंप में बैठे सैकड़ों लोग एक साथ ऊपर की ओर दौड़ पड़ते हैं। रास्ता सिर्फ एक संकरी रस्सी का है। नतीजा यह होता है कि समुद्र तल से 8,000 मीटर ऊपर, जहाँ हवा में सिर्फ 33% ऑक्सीजन होती है और जिसे डेथ ज़ोन कहा जाता है, वहाँ पर्वतारोही घंटों जाम में खड़े रहते हैं। इस भसड़ के कारण कई बार ऑक्सीजन खत्म हो जाती है, शरीर फ्रोस्टबाइट से गलने लगता है, और लोग कतार में खड़े-खड़े ही दम तोड़ देते हैं।

लाशों का ट्रेल और कचरे का अंबार

एवरेस्ट की गरिमा इस कदर तार-तार हो चुकी है कि आज वह दुनिया का सबसे ऊंचा कचरा घर बन चुका है। चारों तरफ खाली सिलेंडर, फटे टेंट और प्लास्टिक बिखरा पड़ा है। इतना ही नहीं, शिखर के रास्ते में दशकों पुरानी लाशें जमी हुई हैं, जिन्हें लांघकर लोग मुस्कुराते हुए अपनी रील्स और सेल्फी खींचते हैं। यह दृश्य रोमांच नहीं, बल्कि मानवीय संवेदनाओं के खोखलेपन की विद्रूपता दिखाता है। यही वजह है कि आज दुनिया के असली और गंभीर पर्वतारोही अब एवरेस्ट को भाव नहीं देते; वे 'के-2' या 'अन्नपूर्णा' जैसी दुर्गम चोटियों का रुख कर रहे हैं।

मुनाफा बनाम प्रकृति: कब जागेगी सरकार?

नेपाल एक विकासशील देश है और उसकी अर्थव्यवस्था का एक बड़ा हिस्सा इसी एवरेस्ट टूरिज्म से आता है। एक परमिट की फीस ही करीब 11-12 लाख रुपये होती है। यही कारण है कि नेपाल सरकार नियम तो बनाती है, जैसे 8 किलो कचरा वापस लाना या ट्रैकिंग चिप लगाना, लेकिन परमिट की संख्या को सीमित करने का कड़ा फैसला लेने से हिचकती है। जब तक पैसे की हवस पर लगाम नहीं कसी जाएगी और यह नियम नहीं बनेगा कि एवरेस्ट आने से पहले किसी ने कम से कम 7,000 मीटर के अन्य पहाड़ों को चढ़ा हो, तब तक यह मौत का तमाशा ऐसे ही चलता रहेगा। एवरेस्ट आज भी उतना ही क्रूर है। आसान सिर्फ सुविधाएं हुई हैं, पहाड़ नहीं। वक्त आ गया है कि हम पहाड़ों को उनकी पुरानी गरिमा और शांति लौटाएं, वरना प्रकृति जब अपना हिसाब मांगती है, तो वह बहुत बेरहम होता है।

About the author

प्रमोद कुमार गोयल

Pramod Kumar Goel · Founder & Editor

पंजाब नेशनल बैंक से सेवानिवृत्त अधिकारी, मेरठ निवासी। एक अनुभवी लेखक एवं संपादक, जिनकी रचनाएँ देश के अनेक प्रमुख समाचार-पत्रों एवं मीडिया मंचों पर प्रकाशित होती रही हैं।

Meerut, Uttar PradeshDecades in printEditor & columnist

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