विचार · 12 जून 2026
आखिर दिल्ली जिमखाना क्लब की ज़रूरत क्या है?
By · द्वारा
प्रमोद कुमार गोयल
Pramod Kumar Goel · Founder & Editor
12 June 2026
6 min read · लगभग 6 मिनट
Meerut, Uttar Pradesh
नई दिल्ली के सत्ता गलियारों में इन दिनों एक क्लब राष्ट्रीय बहस का विषय बना हुआ है—दिल्ली जिमखाना क्लब। पहली नज़र में यह मामला केवल 27.3 एकड़ सरकारी भूमि पर स्थित एक प्रतिष्ठित क्लब के लीज़ विवाद का प्रतीत होता है, किंतु वास्तव में यह स्वतंत्र भारत की उस गहरी वैचारिक लड़ाई का हिस्सा बन चुका है जिसमें एक ओर औपनिवेशिक विरासत और अभिजात विशेषाधिकार हैं, तो दूसरी ओर लोकतांत्रिक समानता और सार्वजनिक संसाधनों पर जनता का अधिकार।
केंद्र सरकार द्वारा क्लब को परिसर खाली करने का नोटिस दिए जाने के बाद यह प्रश्न अचानक राष्ट्रीय विमर्श के केंद्र में आ गया है कि आखिर लोकतांत्रिक भारत में ऐसे संस्थानों की उपयोगिता क्या है? क्या वे सचमुच सामाजिक-सांस्कृतिक संस्थाएं हैं या फिर सत्ता-प्रतिष्ठान के बंद सामंती किले?
दिल्ली जिमखाना क्लब की स्थापना 1913 में ब्रिटिश शासनकाल में “इम्पीरियल दिल्ली जिमखाना क्लब” के रूप में हुई थी। उस समय इसका उद्देश्य स्पष्ट था—ब्रिटिश अधिकारियों और शासक वर्ग के लिए एक विशिष्ट सामाजिक क्षेत्र उपलब्ध कराना। आम भारतीयों के लिए वहां प्रवेश लगभग असंभव था। स्वतंत्रता के बाद अंग्रेज चले गए, देश का विभाजन हो गया, शासन भारतीयों के हाथ में आ गया, किंतु अंग्रेजों द्वारा निर्मित सत्ता-संस्कृति के अनेक प्रतीक यथावत बने रहे। दिल्ली जिमखाना क्लब उन्हीं में से एक है।
समय बदला, सदस्य भारतीय हुए, परंतु क्लब की प्रकृति नहीं बदली। यह धीरे-धीरे उस “लुटियंस इकोसिस्टम” का प्रतीक बन गया जिसमें नौकरशाही, न्यायपालिका, सैन्य प्रतिष्ठान, राजनयिक वर्ग, उद्योगपति और प्रभावशाली राजनेता एक साझा सामाजिक दायरे में उपस्थित रहते हैं। वर्षों से यह धारणा बनती रही कि सत्ता के अनेक अनौपचारिक संवाद और संबंध इन्हीं बंद संस्थागत परिसरों में आकार लेते हैं।
विवाद को और तीखा इस तथ्य ने बनाया कि देश की सबसे महंगी सरकारी जमीनों में शामिल इस परिसर के लिए क्लब दशकों तक प्रतीकात्मक लीज़ रेंट देता रहा। मीडिया रिपोर्टों के अनुसार लगभग ₹1,000 वार्षिक किराये पर हजारों करोड़ रुपये मूल्य की भूमि का उपयोग होना आम नागरिकों के लिए स्वाभाविक रूप से विस्मयकारी है। यदि इस भूमि का बाज़ार मूल्यांकन किया जाए तो इसका अनुमान ₹25,000 करोड़ से लेकर ₹1 लाख करोड़ तक लगाया जा रहा है। ऐसे में यह प्रश्न असंगत नहीं कि सार्वजनिक संपत्ति पर इतना बड़ा विशेषाधिकार आखिर किस नैतिक आधार पर कायम रहे?
क्लब के समर्थकों का पक्ष भी पूरी तरह खारिज नहीं किया जा सकता। उनका कहना है कि यह केवल अमीरों का मनोरंजन केंद्र नहीं, बल्कि एक ऐतिहासिक सामाजिक-सांस्कृतिक संस्था है। यहां खेल गतिविधियां होती हैं, सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित होते हैं, पीढ़ियों से परिवार जुड़े हुए हैं और यह संस्था नॉन प्रोफिट मॉडल पर चलती रही है। समर्थकों का तर्क है कि दुनिया के अनेक देशों में ऐसे हैरिटेज क्लब आज भी मौजूद हैं और उन्हें समाप्त करने के बजाय आधुनिक और अधिक समावेशी बनाया गया है।
लेकिन यहीं सबसे बड़ा प्रश्न खड़ा होता है। यदि यह वास्तव में सार्वजनिक-सामाजिक संस्था है, तो इसकी सदस्यता दशकों लंबी प्रतीक्षा सूची और सीमित अभिजात दायरे में क्यों कैद है? यदि यह केवल खेल और संस्कृति का केंद्र है, तो इसकी सुविधाएं आम नागरिकों के लिए व्यापक रूप से उपलब्ध क्यों नहीं हैं? लोकतंत्र में सार्वजनिक संसाधनों का नैतिक औचित्य तभी बनता है जब उनका लाभ व्यापक समाज तक पहुंचे, न कि केवल प्रभावशाली वर्गों तक सीमित रहे।
यही कारण है कि इस विवाद को अनेक लोग प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की उस व्यापक राजनीतिक परियोजना से जोड़कर देख रहे हैं जिसमें लुटियंस एलीट बनाम नया भारत का विमर्श लगातार उभरता रहा है। पिछले एक दशक में वीआईपी संस्कृति, औपनिवेशिक प्रतीकों और बंद सत्ता नेटवर्कों के विरुद्ध राजनीतिक-सांकेतिक हस्तक्षेप लगातार दिखाई दिए हैं। ऐसे में जिमखाना क्लब पर कार्रवाई समर्थकों के लिए विशेषाधिकार प्राप्त इकोसिस्टम पर प्रहार का प्रतीक बन गई है।
हालांकि विरोधियों की आशंकाएं भी कम नहीं हैं। कुछ लोग इसे केवल प्रतीकात्मक राजनीति मानते हैं। उनका प्रश्न है कि यदि एलीट प्रिविलेज ही समस्या है, तो क्या समान मानदंड अन्य सभी संस्थाओं पर भी लागू होंगे? क्या यह वास्तविक संस्थागत सुधार का प्रयास है या केवल शक्ति-प्रदर्शन? यह सवाल इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि क्लब के सदस्यों में विभिन्न राजनीतिक विचारधाराओं, नौकरशाही और न्यायपालिका से जुड़े प्रभावशाली लोगों के नाम वर्षों से जुड़े रहे हैं।
इसी संदर्भ में न्यायपालिका की निष्पक्षता को लेकर भी सार्वजनिक चर्चा हुई। हालांकि लोकतांत्रिक व्यवस्था का मूल सिद्धांत यही है कि न्यायालय व्यक्तिगत संबंधों से ऊपर उठकर कानून के आधार पर निर्णय देते हैं। अब तक दिल्ली हाई कोर्ट का रुख संतुलित दिखाई देता है—न सरकार को खुली छूट, न क्लब को पूर्ण राहत। इससे स्पष्ट है कि मामला केवल भावनाओं या प्रभाव का नहीं, बल्कि कानून, लीज़ अधिकारों और सार्वजनिक हित के परीक्षण का है।
वास्तविक प्रश्न अंततः यही है कि क्या स्वतंत्र भारत में औपनिवेशिक काल की ऐसी विशिष्ट संस्थाओं को उसी स्वरूप में बने रहना चाहिए? शायद उत्तर पूर्ण विनाश या पूर्ण संरक्षण—दोनों में नहीं है। विरासत संस्थानों को समाप्त करना समाधान नहीं, किंतु सार्वजनिक संसाधनों पर बंद अभिजात्य अधिकारों को अनंतकाल तक जारी रखना भी लोकतांत्रिक मूल्यों के अनुकूल नहीं कहा जा सकता।
दरअसल, यह लड़ाई केवल एक क्लब की नहीं है। यह उस मानसिकता के पुनर्मूल्यांकन की लड़ाई है जिसमें सत्ता, विशेषाधिकार और सार्वजनिक संसाधन कुछ सीमित वर्गों की परिधि में कैद रहे। स्वतंत्र भारत की लोकतांत्रिक चेतना अब उन प्रतीकों से प्रश्न पूछ रही है जिन्हें कभी चुनौती देना असंभव माना जाता था।
दिल्ली जिमखाना क्लब का भविष्य अदालतें तय करेंगी, लेकिन इस विवाद ने देश के सामने एक आवश्यक प्रश्न अवश्य रख दिया है—क्या भारत वास्तव में औपनिवेशिक विशेषाधिकारों से मुक्त हो पाया है, या वे केवल नए चेहरों के साथ अब भी हमारे लोकतंत्र के भीतर जीवित हैं?
About the author
प्रमोद कुमार गोयल
Pramod Kumar Goel · Founder & Editor
पंजाब नेशनल बैंक से सेवानिवृत्त अधिकारी, मेरठ निवासी। एक अनुभवी लेखक एवं संपादक, जिनकी रचनाएँ देश के अनेक प्रमुख समाचार-पत्रों एवं मीडिया मंचों पर प्रकाशित होती रही हैं।
पहले अंक की प्रतीक्षा है?
अगले लेख से पहले सूचना पाएँ
Get notified before the next essay arrives.