सिर्फ 22 किलोमीटर की पट्टी… और दांव पर पूरा पूर्वोत्तर

विचार · 12 जून 2026

सिर्फ 22 किलोमीटर की पट्टी… और दांव पर पूरा पूर्वोत्तर

By · द्वारा

प्रमोद कुमार गोयल

Pramod Kumar Goel · Founder & Editor

12 June 2026

5 min read · लगभग 5 मिनट

Meerut, Uttar Pradesh

भारत के मानचित्र में सिलीगुड़ी कॉरिडोर को पहली नजर में देखने वाला व्यक्ति शायद उसकी असाधारण सामरिक महत्ता का अनुमान न लगा सके। लगभग 20 से 22 किलोमीटर तक सिमट जाने वाली यह पतली पट्टी देखने में भले मामूली लगे, लेकिन इसी भूभाग के सहारे पूरा पूर्वोत्तर भारत देश के मुख्य भूभाग से जुड़ा हुआ है। यही कारण है कि इसे सामान्य बोलचाल में “चिकन नेक” कहा जाता है, जबकि सामरिक हलकों में यह भारत की सबसे संवेदनशील जीवनरेखा मानी जाती है।

असम, अरुणाचल प्रदेश, नागालैंड, मणिपुर, मिजोरम, त्रिपुरा, मेघालय और सिक्किम जैसे राज्य इसी कॉरिडोर के माध्यम से भारत से जुड़े हैं। पूर्वोत्तर तक जाने वाली सड़कें, रेलवे लाइनें, तेल पाइपलाइनें, दूरसंचार नेटवर्क और सैन्य रसद—सब कुछ इसी संकरे भूभाग से होकर गुजरता है। स्वाभाविक है कि यदि किसी कारण यह संपर्क बाधित होता है, तो उसका प्रभाव केवल यातायात तक सीमित नहीं रहेगा; वह राष्ट्रीय सुरक्षा और करोड़ों लोगों के जीवन पर सीधा असर डालेगा।

दरअसल, “चिकन नेक” की संवेदनशीलता भारत विभाजन की देन है। 1947 में पूर्वी पाकिस्तान बनने के बाद पूर्वोत्तर भारत लगभग मुख्य भूभाग से कट गया था। उत्तर बंगाल का यही संकरा हिस्सा दोनों क्षेत्रों के बीच एकमात्र स्थायी संपर्क के रूप में बचा। बाद के वर्षों में यही सिलीगुड़ी कॉरिडोर कहलाया।

इस भूभाग की भौगोलिक स्थिति इसे और अधिक संवेदनशील बना देती है। इसके पश्चिम में नेपाल, पूर्व में बांग्लादेश, उत्तर में भूटान और उससे आगे चीन का तिब्बत क्षेत्र स्थित है। यानी यह ऐसा क्षेत्र है, जो अनेक अंतरराष्ट्रीय सीमाओं के बीच घिरा हुआ है। 1962 के भारत-चीन युद्ध के बाद भारतीय रणनीतिक समुदाय ने पहली बार गंभीरता से महसूस किया कि यदि यह कॉरिडोर संकट में पड़ता है, तो पूरा पूर्वोत्तर भारत अलग-थलग पड़ सकता है। तभी से इसे भारत का “रणनीतिक चोक पॉइंट” माना जाने लगा।

2017 के डोकलाम संकट ने इस चिंता को और गहरा कर दिया। भूटान, चीन और भारत के त्रिकोणीय क्षेत्र के पास स्थित डोकलाम में चीन की बढ़ती गतिविधियों ने भारत को स्पष्ट संकेत दिया कि सिलीगुड़ी कॉरिडोर पर किसी भी प्रकार का दबाव भविष्य में गंभीर चुनौती बन सकता है। इसके बाद भारत ने पूर्वोत्तर में सड़क, रेल और सैन्य अवसंरचना को तेजी से मजबूत करना शुरू किया। सीमा क्षेत्रों में सैन्य तैनाती बढ़ाई गई, ऑल-वेदर सड़कें और सुरंगें बनाई गईं तथा वैकल्पिक संपर्क मार्गों पर भी ध्यान केंद्रित किया गया।

लेकिन चिंता केवल बाहरी खतरों तक सीमित नहीं रही। पिछले कुछ वर्षों में देश के भीतर से भी ऐसे बयान सामने आए, जिन्होंने इस विषय को राष्ट्रीय बहस का हिस्सा बना दिया। वर्ष 2020 में शरजील इमाम का वह विवादित बयान व्यापक चर्चा में आया, जिसमें उसने पूर्वोत्तर भारत को देश से काटने जैसी बात कही थी। उस बयान ने बड़ी संख्या में लोगों को झकझोर दिया, क्योंकि उसने सीधे उस भूभाग का उल्लेख किया था, जिसे भारत की सामरिक जीवनरेखा माना जाता है।

यही वह क्षण था, जब आम भारतीय ने “चिकन नेक” को केवल भूगोल के अध्याय के रूप में नहीं, बल्कि राष्ट्रीय एकता और सुरक्षा के प्रश्न के रूप में देखना शुरू किया। इस घटना ने यह भी स्पष्ट किया कि आधुनिक दौर में खतरे केवल सीमाओं से नहीं आते; वैचारिक और मनोवैज्ञानिक स्तर पर भी राष्ट्र को अस्थिर करने के प्रयास किए जा सकते हैं।

दक्षिण एशिया की बदलती भू-राजनीति ने भी इस क्षेत्र की संवेदनशीलता बढ़ाई है। चीन लंबे समय से तिब्बत, भूटान, बांग्लादेश और म्यांमार के माध्यम से क्षेत्रीय प्रभाव बढ़ाने की कोशिश कर रहा है। भारत इसे केवल कूटनीतिक गतिविधि नहीं, बल्कि व्यापक सामरिक रणनीति के रूप में देखता है। यही कारण है कि भारत अब सिलीगुड़ी कॉरिडोर को किसी एक मार्ग के रूप में नहीं, बल्कि बहुस्तरीय सुरक्षा तंत्र के रूप में विकसित करने की दिशा में आगे बढ़ रहा है।

हाल में पश्चिम बंगाल सरकार द्वारा इस क्षेत्र में लगभग 120 एकड़ भूमि केंद्र सरकार को सौंपे जाने की खबरों ने इस बहस को नया आयाम दिया है। माना जा रहा है कि इस भूमि का उपयोग बीएसएफ प्रतिष्ठानों के विस्तार, सामरिक सड़क चौड़ीकरण, सैन्य लॉजिस्टिक्स और राष्ट्रीय राजमार्गों के पुनर्गठन के लिए किया जा सकता है। यदि ऐसा होता है, तो यह केवल एक प्रशासनिक कदम नहीं होगा, बल्कि भारत की दीर्घकालिक सुरक्षा रणनीति का हिस्सा माना जाएगा।

स्पष्ट है कि भारत अब केवल “रक्षात्मक” सोच तक सीमित नहीं रहना चाहता। उसकी रणनीति में सैन्य मजबूती के साथ आर्थिक एकीकरण, वैकल्पिक संपर्क व्यवस्था और पूर्वोत्तर के व्यापक विकास को भी शामिल किया जा रहा है। नई रेल परियोजनाओं, बांग्लादेश मार्गों और आधुनिक निगरानी प्रणालियों पर बढ़ता जोर इसी सोच का संकेत है।

सिलीगुड़ी कॉरिडोर आज केवल एक संकरा भूभाग नहीं है। वह भारत की राष्ट्रीय एकता, सामरिक स्थिरता और पूर्वोत्तर के भविष्य का प्रतीक बन चुका है। 21वीं सदी के बदलते सुरक्षा परिदृश्य में यह क्षेत्र भारत की उस परीक्षा का केंद्र है, जिसमें उसे बाहरी चुनौतियों के साथ-साथ आंतरिक विघटनकारी प्रवृत्तियों से भी एक साथ जूझना है।

भारत के मानचित्र पर यह भले एक पतली रेखा दिखाई देती हो, लेकिन उसकी मजबूती पर ही करोड़ों भारतीयों की सुरक्षा और देश की अखंडता टिकी हुई है।

About the author

प्रमोद कुमार गोयल

Pramod Kumar Goel · Founder & Editor

पंजाब नेशनल बैंक से सेवानिवृत्त अधिकारी, मेरठ निवासी। एक अनुभवी लेखक एवं संपादक, जिनकी रचनाएँ देश के अनेक प्रमुख समाचार-पत्रों एवं मीडिया मंचों पर प्रकाशित होती रही हैं।

Meerut, Uttar PradeshDecades in printEditor & columnist

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